नवसंवत्सर के साथ आज से शुरू होंगे वासंती नवरात्र, मां दुर्गा को ऐसे करें प्रसन्न

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पंडित रतन शास्त्री (दादिया),
फतेहलालनगर, किशनगढ़, अजमेर (राजस्थान)

जयपुर। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा शनिवार विक्रम संवत् 2079 शक संवत 1944 तदनुसार दिनांक 2 अप्रेल 2022 से हमारा वैक्रमीय अभिनव वर्षारम्भ हो रहा है। यह हमारा अभिनव वर्षारम्भ ही नहीं है, अपितु सृष्टि का आरम्भ तथा कल्पारम्भ भी है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार अश्विनी नक्षत्र के दिन ही विधाता ने जगत् की संरचना प्रारम्भ की थी।

श्री दुर्गा की उपासना के दो पुनीत अवसर माने गये हैं। वासन्तिक व शारदीय नवरात्र शक्ति उपासना के लिए सबसे श्रेष्ठ समय है। ये नवरात्र सावर्णिक हैं। नवरात्र पूरे न हो सके तो सप्तरात्र, पञ्चरात्र, त्रिरात्र, युग्मरात्र अथवा एकरात्र व्रत ही करना चाहिए।
नवरात्र में नवगौरी और नवदुर्गा के नवरात्र में भारतवर्ष की समस्त आस्तिक जनता अशुभ के नाश एवं शुभता की प्राप्ति के लिए भगवती पराशक्ति नवगौरी और नवदुर्गाओं के नवरात्र महोत्सव को घटस्थापना, पूजन, पाठ, हवन, अर्चन, यज्ञ, व्रतादि के द्वारा सम्पन्न करती है। नव शब्द का अर्थ है नवीन और नौ की संख्या भी। अतएव नवीन वर्ष के शुभारम्भ में नवगौरी और नवदुर्गा की आराधना सर्वथा उचित ही है।

घटस्थापना के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त

इस वर्ष वासन्ती नवरात्र चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (एकम्) शनिवार तद्नुसार दिनांक 2 अप्रैल 2022 से प्रारम्भ हो रहे हैं।
घटस्थापना जयपुर सूर्योदय समय स्टैंडर्ड समयानुसार मीन द्विस्वभाव लग्न सूर्योदय प्रात: 06 बजकर 21 मिनट से 06 बजकर 55 मिनट तक अभिजित् मुहूर्त मध्याह्न 12.06 बजे से 12.55 बजे तक श्रेष्ठ रहेगा। इसके अतिरिक्त वैधृति त्यक्त शुभ वैला में प्रात: 07. 53 बजे से 08. 18 बजे तक शुभ मुहूर्त रहेगा।

इसी प्रकार मदनगंज - किशनगढ़ सूर्योदय स्टेन्डर्ड समयानुसार चैत्र नवरात्रारम्भ एवं घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त -

(1) मीन द्विस्वभाव लग्न में सूर्योदय 06. 25 बजे से 06 बजकर 59 बजे से तक

(2). अभिजित् मुहूर्त मध्याह्न 12. 10 बजे से 12. 59 बजे तक,

(3). वैधृति त्यक्त शुभ वेला में प्रात: काल 08. 04 बजे से 08. 28 बजे तक श्रेयस्कर रहेगा।

इन नवरात्र में शाक्त (शक्ति उपासकों) को दुर्गा सप्तशती ललिता सहस्रनामस्तोत्र, दुर्गासहस्रनामस्तोत्र, दुर्गाचालीसा विन्ध्येश्वरीचालीसा आदि का अनुष्ठान करना अतिश्रेष्ठ रहता है वहीं श्रीवैष्णव उपासकों को वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस का नवाह्न पारायण, सुन्दर काण्ड, रामरक्षास्तोत्र श्रीरामस्तवराज, हमुमत्कवच, हनुमत्वड़वानलस्तोत्र आदि का अनुष्ठान अतिश्रेष्ठ रहता है। कुलदेवी दुर्गाष्टमी की पूजा अष्टमी शनिवार दिनांक 9अप्रैल 2022 को ही होगी। अष्टमी कुल देवी पूजन मध्याह्न अभिजित् मुहूर्त में 12.15 बजे से करनी चाहिये।
रामनवमी उत्सव चैत्र शुक्ल नवमी रविवार दिनांक 10 अप्रैल 2022 को मनाया जायेगा। इस दिन रविपुष्य का अतिश्रेष्ठ सुयोग भी बन रहा है। अत: रामरक्षा स्तोत्र का पाठ इस दिन अवश्य करना चाहिए।

नवरात्र में कन्या भोजन का बड़ा महत्व है। अष्टमी या नवमी के दिन 9 कन्याओं (जो 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष के बीच की आयु हो ) एवं दो बालकों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देना चाहिए। दक्षिणा में फल (विशेष रूप से अनार का फल) देना चाहिए क्योंकि कन्यायें शक्तिस्वरूपा जगदम्बा का साक्षात् स्वरूप है।

नवरात्र का रहस्य

चान्द्रमास के अनुसार चार नवरात्र होते हैं – आषाढ़ शुक्ल पक्ष में आषाढीय गुप्त नवरात्र , आश्विन शुक्लपक्ष में शारदीय नवरात्र , माघ शुक्ल पक्ष में शिशिर कालीन गुप्त नवरात्र एवं चैत्र शुक्ल पक्ष में वासन्ती नवरात्र।
तथापि परंपरा से दो नवरात्र – चैत्र एवं आश्विन मास के नवरात्र ही सर्वमान्य है ।गुप्त नवरात्र सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के लिए विहित है।
चैत्रमास मधुमास एवं आश्विनमास ऊर्ज मास नाम से प्रसिद्ध है जो शक्ति के पर्याय हैं।
अत: शक्ति आराधना हेतु इस काल खण्ड को नवरात्र शब्द से सम्बोधित किया गया है :- नवानां रात्रीणां समाहार: अर्थात् नौ रात्रियों का समूह।
रात्रि का तात्पर्य है विश्रामदात्री , सुखदात्री के साथ एक अर्थ जगदम्बा भी है,।
..,रात्रिरुपयतो देवी दिवरुपो महेश्वर: …..
तन्त्रग्रन्थों में तीन रात्रि – कालरात्रि (महाशिवरात्रि ) फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी महाकाली की रात्रि , मोहरात्रि -आश्विन शुक्लपक्ष अष्टमी महासरस्वती की रात्रि , महारात्रि- कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या महालक्ष्मी की महारात्रि।
… एक अंक से सृष्टि का आरम्भ है । सम्पूर्ण मायिक सृष्टि का विस्तार आठ अंक तक ही है .,,
…,इससे परे ब्रह्म है जो नौ अंक का प्रतिनिधित्व करता है .अस्तु नवमी तिथि के आगमन पर शिव शक्ति का मिलन होता है ।
शक्ति सहित शक्तिमान् को प्राप्त करने हेतु भक्त को नवधा भक्ति का आश्रय लेना पड़ता है , जीवात्मा नौ द्वार वाले पुर(शरीर) का स्वामी है – नवछिद्रमयो देह: . इन छिद्रों को पार करता हुआ जीव ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है .-…,।
अत: नवरात्र की प्रत्येक तिथि के लिए कुछ साधन ज्ञानियों द्वारा नियत किये गये है …..
प्रतिपदा – इसे शुभेच्छा कहते हैं । जो प्रेम जगाती है प्रेम बिना सब साधन व्यर्थ है , अस्तु प्रेम को अविचल अडिग बनाने हेतु शैलपुत्री का आवाहन पूजन किया जाता है । अचल पदार्थों में पर्वत सर्वाधिक अटल होता है ।
द्वितीया – धैर्यपूर्वक द्वैतबुद्धि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए माँ ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए ।
तृतीया – त्रिगुणातीत (सत् , रज ,तम से परे) होकर माँ चन्द्रघण्टा का पूजन करते हुए मन की चंचलता को वश में करना चाहिए ।
चतुर्थी – अन्त:करण चतुष्टय मन ,बुद्धि , चित्त एवं अहंकार का त्याग करते हुए मन, बुद्धि को कूष्माण्डा देवी के चरणोँ में अर्पित करें ।
पंचमी – इन्द्रियों के पाँच विषयो अर्थात् शब्द, रूप’ रस’ गन्ध ‘स्पर्श का त्याग करते हुए स्कन्दमाता का ध्यान करें ।
षष्ठी – काम – क्रोध – मद – मोह – लोभ एवं मात्सर्य का परित्याग करके कात्यायनी देवी का ध्यान करें ।
सप्तमी – रक्त , रस, माँस, मेदा, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र इन सप्त धातुओं से निर्मित क्षण भंगुर दुर्लभ मानव देह को सार्थक करने के लिए कालरात्रि देवी की आराधना करें।
अष्टमी – ब्रह्म की अष्टधा प्रकृति पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहंकार से परे महागौरी के स्वरूप का ध्यान करता हुआ ब्रह्म से एकाकार होने की प्रार्थना करें ।
नवमी – माँ सिद्धिदात्री की आराधना से नवद्वार वाले शरीर की प्राप्ति को धन्य बनाता हुआ आत्मस्थ हो जाय ।
-पौराणिक दृष्टि से आठ लोकमाताएँ हैं तथा तन्त्रग्रन्थों में आठ शक्तियाँ है…,1. ब्राह्मी – सृष्टिक्रिया प्रकाशित करती है ।2. माहेश्वरी – यह प्रलय शक्ति है ।3. कौमारी – आसुरी वृत्तियोँ का दमन करके दैवीय गुणोँ की रक्षा करती है ।4. वैष्णवी – सृष्टि का पालन करती है ।5. वाराही – आधार शक्ति है इसे काल शक्ति कहते है ।6. नारसिंही – ये ब्रह्म विद्या के रुप मेँ ज्ञान को प्रकाशित करती है7. ऐन्द्री – ये विद्युत शक्ति के रुप मेँ जीव के कर्मो को प्रकाशित करती है ।8. चामुण्डा – प्रवृत्ति (चण्ड) निवृत्ति (मुण्ड) का विनाश करने वाली है ।

आठ आसुरी शक्तियाँ -1. मोह – महिषासुर 2. काम – रक्तबीज 3. क्रोध – धूम्रलोचन 4. लोभ – सुग्रीव 5. मद मात्सर्य – चण्ड मुण्ड 6. राग द्वेष – मधु कैटभ 7. ममता – निशुम्भ 8. अहंकार – शुम्भ
,… अष्टमी तिथि तक इन दुगुर्णों रूपी दैत्यो का संहार करके नवमी तिथि को प्रकृति पुरुष का एकाकार होना ही नवरात्र का आध्यात्मिक रहस्य है ।नौ ही क्यों ?
………..
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे प्रकृतिरष्टधा ।

कहकर भगवान ने आठ प्रकृतियों का प्रतिपादन किया है इनसे परे केवल ब्रह्म ही है अर्थात् आठ प्रकृति एवं एक ब्रह्म ये नौ हुए जो परिपूर्णतम है।

नौ देवियाँ , शरीर के नौ छिद्र , नवधा भक्ति ,नवरात्र ये सभी पूर्ण हैं।
नौ के अतिरिक्त संसार मे कुछ नहीँ है इसके अतिरिक्त जो है वह शून्य (0) है ।

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