श्रीद्वारिकाधीश मंदिर में सावन-भादों के दर्शन : तन के साथ मन की तृप्ति

Spread the love

✍️मधुप्रकाश लड्ढा, राजसमन्द(राज.)
प्रभु श्री द्वारिकाधीश जी की इच्छा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है… न दर्शन, न भक्ति, न शक्ति, न मुक्ति। इंसान हैं, तो मोह माया भी साथ ही चलते हैं लेकिन इन बंधन की बेड़ियों को प्रभु भक्ति से ही मुक्त किया जा सकता है। पुष्टिमार्गीय परम्परा अनूठी है, पुष्टि का शाब्दिक अर्थ होता है ‘पोषण’ और भक्ति सबसे सरल मार्ग है ईश्वर की आराधना का। हम दर्शन और मनोरथ के माध्यम से सुकून और शांति का अहसास महसूस करते हैं।

कांकरोली के प्रभु श्री द्वारिकाधीश जी मंदिर में वर्ष भर विभिन्न मनोरथ और दर्शन होते रहते हैं। कभी नाव मनोरथ तो कभी सावन-भादो के। कभी छप्पन भोग तो कभी राल के दर्शन। हर मनोरथ अपनी छठा बिखेर कर आनन्द में डुबो जाता है।
आज भी सावन-भादो के अप्रतिम दर्शन की फुहारों ने तन के साथ मन को भी भिगो दिया। मानो पानी नहीं अमृत की बूंदे बरस रही हो। मन ऐसा भीगा की गोविंद के दर्शन कि बार-बार लालसा जाग उठी। हजार बार निहारूँ उसके रूप को लेकिन उसके दर्शन का लोभ कभी कम हुआ ही नहीं। इस मामले में मुझे लोभी बनाए रखना मेरे प्रभु।

हम सनातनी है। देव दर्शन हमारी सामाजिक परम्परा का अभिन्न अंग है। युवा पीढ़ी को इस परंपरा का ज्ञान कराना हमारा नैतिक दायित्व है। श्री चारभुजा जी, श्री एकलिंग जी, श्रीनाथ जी और श्री द्वारिकाधीश जी मेवाड़ के चार प्रमुख धाम माने जाते हैं। हमें संकल्प लेना होगा इनके मान, सम्मान और सुरक्षा का। यह तभी सम्भव है जब हम युवा पीढ़ी को इस और अग्रसर कर पाएंगे। यह कार्य हमें स्वयं से ही शुरू करना होगा। हम जहां भी रहें, घर परिवार की तरुणाई को साथ लेकर देव दर्शन जाने की आदत बनानी होगी। उन्हें बताना होगा ‘सनातन धर्म’ के बारे में। सदियों से चली आ रही परम्पराओं से उनका साक्षात्कार जरूरी है। तर्क और आस्था के भेद को समझाना होगा। नास्तिक और आस्तिक के मर्म को समझाना होगा। सदियों पहले ऋषि-मुनियों और ज्ञानियों द्वारा स्थापित हमारी आस्थाएं भी ज्ञान और विज्ञान पर ही आधारित है और यह संकल्प ही युवा पीढ़ी के जीवन का मार्ग प्रशस्त करेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *