संक्रामक रोगों से बचाव के लिए शोध और तैयारी जरूरी

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आईएनएसए की पहली महिला अध्यक्ष प्रो. चंद्रिमा शाहा का विशेष व्याख्यान


जयपुर.
जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग प्रणाली में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय यात्रा में वृद्धि जैसे पर्यावरणीय कारणों से जहां सीओ2 उत्सर्जन में वृद्धि हुई है वहीं नई और पुन उत्पन्न होने वाली बीमारियां शुरू हो रही हैं जिनमें मच्छर आदि जैसे अन्य वैक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की पहली महिला अध्यक्ष निर्वाचित प्रो. चंद्रिमा शाहा ने राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में उभरती संक्रामक बीमारियों और हमारी प्रतिरक्षा के लिए चुनौतियां विषय पर विशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला में व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए यह बात कहीं।
प्रो चंद्रिमा शाहा एफटीडब्ल्यूएएस, एफएनए, एफएएससी, एफएनएएससी, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष जेसी बोस प्रतिष्ठित चेयर प्रोफेसर राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी पूर्व निदेशक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी दिल्ली और विश्व विज्ञान अकादमी के फेलो निर्वाचित हैं।
डॉ. शाहा ने एड्स, सार्स, इबोला और फिर कोविड-19 जैसी संक्रामक बीमारियों के उभरने के इतिहास को साझा किया और कहा कि इस तरह के संक्रमण अब हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। उन्होंने कहा कि 20वीं सदी की शुरुआत में काफी मौतें हुई थीं लेकिन दुनिया भर में टीकाकरण कार्यक्रमों के बाद काफी बदलाव आया और हमारे पास अपने देश से पोलियो और चेचक को पूरी तरह से खत्म करने का एक अच्छा उदाहरण है।
उन्होंने आगे कहा कि बैक्टीरियल वायरल और फंगल संक्रमण दुनिया भर में बड़ी चुनौतियां दे रहे हैं। हालांकि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली हमें हमलावर रोगजनकों से बचाती है और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की विफलता बीमारियों का कारण बनती है और होस्ट एवं रोगजनकों के बीच निरंतर संघर्ष ने हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को आकार दिया है जो आज हमारे पास है। प्रतिरक्षा की समझ के आधार पर टीकों और दवाओं की रूपरेखा बनाई जाती है और अतीत की महामारियों से ली गई सीख से तैयार टीके बीमारियों के खिलाफ हमारी लड़ाई में महत्वपूर्ण निभाते हैं।
उन्होंने बताया कि रोगजनक आमतौर पर मानव आबादी के साथ लंबे समय तक संक्रमण के बने रहने की गंभीरता को कम करते हैं। उन्होंने इस तरह के शोध को बेहतर बनाने और मानव शरीर क्रिया विज्ञान पर रोगजनकों के प्रभावों का पता लगाने के लिए धन जुटाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने निवारक तरीकों पर नीतिगत मामलों की भूमिका पर भी जोर दिया जो ऐसे संक्रमणों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मौलिक एवं ट्रांसलेशनल अनुसंधान में फंड में वृद्धि और बेहतर सरकारी नीतियों तथा मानव व्यवहार भविष्य की महामारियों को कम कर सकती है।
इससे पूर्व राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने अपने स्वागत भाषण में प्रो. चंद्रिमा शाहा का स्वागत करते हुए कहा कि इस महामारी से निपटने के साथ हमने सीखना शुरू कर दिया है कि इस वायरस के साथ लंबे समय तक कैसे सहअस्तित्व में रहना है। प्रो भालेराव ने कहा कि भविष्य में महामारी के लिए तैयार राष्ट्र बनने के लिए वैज्ञानिक समुदाय का विकास और वैज्ञानिक वातावरण विकसित करना महत्वपूर्ण है क्योंकि ये संक्रामक रोग दुनिया भर के लिए महत्वपूर्ण खतरा बना हुआ हैं।
कोविड-19 महामारी ने इस ओर ध्यान आकर्षित किया हैं कि इस प्रकार की महामारी से निपटने के लिए वैज्ञानिक मनोदशा का निर्माण कैसे महत्वपूर्ण है। अर्जित ज्ञान हमें इसके उपचार और रोकथाम में मदद कर सकता है। हमें संपूर्ण जीवन के विभिन्न चरणों में अपने स्वास्थ्य एवं कुशलताए मुख्य रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली पर ध्यान देने की अधिक आवश्यकता है।
इस वर्ष भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रतिष्ठित व्याख्यान श्रृंखला का केंद्रीय विषय है जिसे राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रारंभ किया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षा, व्यवसाय, कला एवं संस्कृति और नागरिक सेवा के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को अपने विचार व्यक्त करने हेतु आमंत्रित किया जाना है।
इस व्याख्यान में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षक, कर्मचारी और अतिथि उपस्थित रहे।

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