कदी न कर यो जी भेद थांनै ज्यात-पांत में

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कवि मुरलीधर गौड़ ने सुनाए विभिन्न चेतना गीत
आखर में राजस्थानी साहित्य पर चर्चा


जयपुर.
प्रभा खेतान फाउण्डेशन की ओर से ग्रासरूट मीडिया फाउण्डेशन के सहयोग से शनिवार को आखर कार्यक्रम आयोजित किया गया। श्रीसीमेंट की ओर से समर्थित इस कार्यक्रम में कवि मुरलीधर गौड़ ने विभिन्न सामाजिक चेतना गीत सुनाए। इन गीतों में जाति-भांति को भेद दूर करने, बालिका सशक्तीकरण, शृंगार और अध्यात्म विषय भी शामिल रहे। उनसे साहित्यकार विजय जोशी ने साहित्यिक चर्चा की।
अपने आरम्भिक जीवन की जानकारी देते हुए गीतकार मुरलीधर गौड़ ने बताया कि मेरे पिता चित्रकला, मूर्तिकला, अभिनय और खेल-तमाशे के माने हुए कलाकार रहे। आज भी गाँव में सभी उन्हें उस्ताद कहकर ही बुलाते हैं। इस कारण अभिनय और गाने के साथ सुर ताल की समझ विरासत में मिली। कोटा जिले के हिंगी गाँव में जन्मे मुरलीधर गौड़ ने आगे कहा कि मेरी माँ ने तीज-त्यौहार पर बनाये जाने वाले मांडणे और लीपी-पुती भींतों पर लकीरें खींचने से कभी नहीं रोका। इसका यह परिणाम हुआ कि चित्रकारी करने लगा। पाँचवी तक गाँव में पढ़ाई के बाद दो कोस दूर जोलपा स्कूल में पैदल तो कभी-कभी दोस्त की साईकिल से जाकर से आठवीं तक पढ़ाई की। एक बार यहाँ आधी छुट्टी के समय कवियों का कार्यक्रम रखा गया। इसमें मुझे कवि गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ के गीत इतने भाए कि मुझमें भी गीत लिखने की हूक जागृत हुई। तब मैनें सातवीं कक्षा में पहला गीत लिखा तो उसे सभी ने सराहा। जब सांगोद में साइन्स मैथ्स लेकर हायर सैकण्डरी की तब भी गीत लिखता।
इसके बाद कोटा में डीसीएम में ऑपरेटर के पद पर नौकरी लगी तब कोटा के साहित्यिक माहौल के साथ कवि गोष्ठी में जाने का अवसर मिला। पहली ही गोष्ठी में जोरदार प्रोत्साहन मिला और आकाशवाणी से बुलावा भी। तब से अब तक गीतों की यह यात्रा अनवरत जारी है।
अपने लेखन के बारे में उन्होंने बताया कि राजस्थानी मेरे संस्कारों में है जो माँ की घुट्टी और लौरी सुनकर बड़ी हुई है। इसमें हर बात कहना आसान है इसीलिए मैं अपने संस्कारों की भाषा राजस्थानी में ही लिखता हूँ और लिखता रहूँगा।
कार्यक्रम में मुरलीधर गौड़ ने अपने लोकप्रिय गीत गुरु महिमा का सस्वर पाठ करते हुए गीत की आभा और आस्था के स्वरों के साथ श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
राजा अर रंक तार या दोनी एक साथ में
कदी न कर यो जी भेद थांनै ज्यात.पांत में
सूर का थां श्याम रसखान ईं सुणाई तान
थांही जा बेठ्या तुलसीदास की दावत में
गुड्डी. पतंग के प्रतीक से उन्होंने अपना गुड्डी गीत सुनाकर सामजिक परिवेश की वास्तविक स्थिति का चित्रण किया। वहीं माण्ड बेटी माण्ड गीत के माध्यम से बेटी को पढ़ा कर उसे आगै बढऩे की प्रेरणा दी। उन्होंने अगवाणी, मजो दूणो हो जातो री और हरिया रे हरिया आदि गीतों के माध्यम से जीवन में शृंगार के उदात्त भावों को उभारते हुए श्रोताओं को विरह और मिलन के सन्दर्भों से जोड़ दिया।
जगत् की बात जगत से करते हुए के इस शृंगारिक भाव से भरपूर होने के पश्चात् अध्यात्म के रंग का गीत चीर सुनाकर मुरलीधर गौड़ ने सम्मिश्रित भाव प्रस्तुत किया।
जळ की पारदरसता ढाँकै ओढ़ गयो काँझी को चीर
मोह वासना पट ओढ्यां यूँ पाँच तत्व की या जागीर
ज्याँको यो पट चौरी होग्यो सुधर गई वाँ की तकदीर
अंतर सूँ अंतर मलग्यो रै मटगी जनम जनम की पीर
कांई करैगो असल छोडकऱ नटखट नक़ली चीर को
कब तक ठाड़ी रहूँ सायरो लै जमना का नीर को
अंत में ग्रासरूट मीडिया के प्रमोद शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से एवं श्रीसीमेंट के सहयोग से राजस्थानी साहित्य, कला और संस्कृति से लोगों को जोडऩे के लिए आखर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। हमारे लोक गीतों को बचाना बहुत जरूरी है। गीतों की धरोहर महिलाओं के पास है उनके पास हर संस्कार के गीत है। हम राजस्थान के चारों कोनों से संकलित गीतों का हर सप्ताह कार्यक्रम रख सकते है। बरसात होने के बाद यह करने का प्रयास करेंगे क्योंकि किसान की खुशहाली में ही समाज की खुशी है। इन गीतों को बचाए रखना समाज हित में है। आशा है कि अगले माह होने वाले आखर पोथी और आखर में आप सभी शामिल होंगे। एक बार फिर से आप सभी का आभार।

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