मटका सिंचाई पद्धति से बढ़ सकती है हरियाली

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चारागाह में लगाए पौधे बन रहे है पेड़

की जा सकती है फलों और सब्जियों की खेती भी


जयपुर.
पर्यावरण को बचाने और हरियाली को बढ़ाने के लिए पौधरोपण की सफलता जरूरी है। इसकी सफलता के लिए काफी पानी की जरूरत पड़ती है जो बहुत से स्थानों पर उपलब्ध नहीं है। ऐसे में हजारों वर्ष पुरानी मटका सिंचाई पद्धति से हरियाली बढ़ाई जा सकती है।
जोधपुर जिले की पीपाड़ शहर पंचायत समिति अन्तर्गत तिलवासनी ग्राम पंचायत का चारागाह इसी का ज्वलन्त उदाहरण दे रहा है। तिलवासनी में महात्मा गांधी नरेगा योजना के अन्तर्गत चारागाह विकास कार्य स्वीकृत किया गया तथा 6 लाख 89 हजार की धनराशि व्यय कर पूर्ण किया गया। इसमें लगाए गए कुल 300 पौधों में से 250 पौधे जीवित हैं और इनका सुरक्षित पल्लवन व विकास हो रहा है। और इसके पीछे मटका थिम्बक पद्धति का प्रयोग महत्वपूर्ण है। ग्राम पंचायत तिलवासनी के सरपंच अनिल बिश्नोई ने चारागाह में पौधारोपण के लिए मटका पद्धति के इस प्रयोग की अनुकरणीय पहल की है जिसके उत्साहजनक एवं आशातीत परिणाम सामने आए हैं।
मटका थिम्बक पद्धति के बारे में मान्यता है कि यह 4 हजार साल पुरानी सिंचाई पद्धति है जिसका प्रयोग ईरान, दक्षिण अमरीका आदि में किया जा रहा है। इसके बाद भारत, पाकिस्तान, ब्राजील आदि देशों ने भी इसे अपनाया। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी अथवा सिंचाई प्रबन्धन की कमी के कारण भी समस्या पैदा हो जाती है। इन सभी परिस्थितियों में मटका थिम्बक पद्धति बेहद कारगर सिद्ध होती है।
एक मटका लें और उसे पौधे के पास जमीन में गड्ढा खोद रख दें। मटका इस तरह रखा जाए कि उसका मुँह जमीन के बाहर रहे। मटके को ऊपर तक पानी से भर दें। मटके के छिद्रों से पानी रिस-रिस कर पेड़ की जड़ों तक पहुंचेगा और उसको सींचेगा। पौधे के आस-पास घास-फूस पत्तियां डाल दें ताकि मिट्टी की नमी बरकरार रह सके। मटके को कवर करके रखें। गुजरात, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश में बरसों से इस पद्धति का प्रयोग हरियाली विस्तार का माध्यम बना हुआ है।
इस सिंचाई पद्धति से 70 फीसदी तक पानी बच सकता है। रेतीले इलाके में यह पद्धति बेहद कारगर साबित हो सकती है। लोग पौधों को न केवल लगा रहे बल्कि उनको सहेज भी रहे हैं। पौधों की परिजनों की तरह देखभाल की जा रही है। यह पद्धति मिट्टी, पौधों की सेहत और आय तीनों के लिए फायदेमंद है। मटका सिंचाई पद्धति से पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है। सिंचाई पद्धति से पूरे साल फसल उत्पादन संभव है। मटका भरने की जरूरत 20-24 घंटे में पड़ती है। इस पद्धति में पानी के साथ समय की बचत होती है। कम संसाधन और आसान तकनीक अपनाने से ही पौधे का विकास भी तेजी से होता दिखता है।
इसके माध्यम से फलों और सब्जियों की खेती भी की जा सकती है। इसमें सबसे कम मात्रा में पानी की खपत होती है यानी पानी की ज्यादा से ज्यादा बचत की जा सकती है। यह एक ऐसी सरल सहज और बिना पैसों की तकनीक है जिससे कम पानी में भी पौधा जीवित रह सकता है और पानी का भी अपव्यय नहीं होता है।

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