खेताराम के प्रयोग ने दिखाई किसानों को नई राह

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रेगिस्तान में लहलहाई खुशियों की फसल

सीकर, 19 फरवरी। राजस्थान में अनेक स्थानों पर भूमिगत जल समाप्त हो चुका है एवं सरकार द्वारा उन स्थानों को शुष्क भूमि (डार्क जोन) घोषित कर दिया गया है। ऐसे स्थानों पर कृषि तथा बागवानी किसी भी व्यक्ति को असम्भव लगेगी। लेकिन यह सम्भव कर दिखाया है ग्राम दांता, जिला सीकर, राजस्थान के निवासी डॉ. खेताराम कुमावत ने अपने अथक प्रयासों से। डॉ. खेताराम, रसायन शास्त्र से पीएच.डी. हैं तथा तेल एवं प्राकृतिक गैस कॉरपोरेशन, भारत सरकार में उप महाप्रबंधक पद से सेवा निवृत हैं। इन्होंने बालू रेत वाली भूमि में वर्षा जल संग्रहण के लिए एक नया प्रयोग कर यह सफलता प्राप्त की है।

डॉ. खेताराम ने सर्वप्रथम रेतीले टीलों का ढलान एक तरफ बनाकर, खेत के निचले भाग में एक 15,00,000 लीटर क्षमता का कच्चा फार्म पौंड बनाया तथा उसमें 500 माइक्रोन मोटाई वाली प्लास्टिक शीट बिछा दी। राजस्थान का पश्चिमी भाग कम वर्षा एवं बालू रेत वाला होने के कारण वर्षा जल सामान्यत: बहकर फार्म पौंड में नहीं आता है। इसलिए जल संग्रहण हेतु फार्म पौंड के आस पास प्लास्टिक शीट बिछाने की योजना बनाई। खेत की जमीन पर प्लास्टिक शीट बिछाने से आय कम नहीं हो, अत: पहले जोजोबा पौधारोपण किया एवं तत्पश्चात् इन पौधों की पंक्तियों के मध्य 75 माइक्रोन पतली प्लास्टिक बिछाकर फार्म पौंड में जल संग्रहण में सफलता प्राप्त की।

15 लाख लीटर क्षमता का फार्म पौण्ड
सीकर जिला में मानसून में लगभग 40 सेमी औसत वर्षा होती है। 15,00,000 लीटर क्षमता वाले फार्म पौंड को पूरा भरने हेतु गणना कर, पौधों की कतारों के मध्य 4000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में प्लास्टिक शीट बिछाई गई। इस युक्ति से 2017 से प्रत्येक वर्ष मानसून में फार्म पौंड वर्षा जल से सम्पूर्ण भर जाता है। वर्षा जल का उपयोग कर, ऊर्जा संरक्षण की दृष्टि से सौर ऊर्जा तथा जल संरक्षण के लिए बूंद बूंद सिंचाई विधि (ड्रिप इरिगेशन) से 10,000 वर्ग मीटर में जोजोबा का बगीचा विकसित किया है तथा 2,000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाले ग्रीन हाउस में खीरा, शिमला मिर्च आदि सब्जियों की जैविक विधि से खेती की जाती है। जोजोबा एक औषधीय पौधा है जो कम पानी में विकसित हो जाता है। इसके बीजों से अत्यधिक चिकनाई वाला तेल प्राप्त होता है, जो चर्म रोगों के उपचार, सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुएं बनाने एवं एटीएफ में लुब्रिकेशन के काम आता है। शुष्क भूमि वाले रेतीले धोरों में जोजोबा के बीज तथा सब्जियों की पैदावार से केवल 12,00,000 वर्ग मीटर भूमि से लगभग 8-10 लाख की वार्षिक आय हो जाती है। साथ ही सदाबहार सघन हरियाली देख कर सहज संतोष तो प्राप्त होता ही है, पर्यावरण भी शुद्ध रहता है।

इसके अतिरिक्त, फार्म हाउस की छत से पक्के हौज में 1,25,000 लीटर वर्षा जल संग्रहण करते हैं तथा पूरे वर्ष केवल संचित वर्षा जल ही नहाने, धोने, अन्य गृह कार्यों एवं देशी गायों को के पालन पोषण में काम में लेते हैं। ऊर्जा संरक्षण हेतु घर पर भी सौर ऊर्जा एवं गोबर गैस का उपयोग करते हैं।

500 किसानों को मिली प्रेरणा

इस प्रकार, डॉ. खेताराम, शुष्क भूमि में केवल प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित एक नूतन प्रयोग द्वारा फार्म विकसित कर, किसानों को प्रेरणा देने का निस्वार्थ कार्य भी कर रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में चुरू, सीकर, झुंझुनूं, दौसा जिला एवं आस पास के क्षेत्रों से लगभग 500 किसान फार्म पर आकर, शुष्क भूमि में कृषि कार्य की प्रेरणा ले चुके हैं तथा 250 किसानों ने फार्म पौंड बनाकर कृषि कार्य प्रारम्भ कर दिया है। यह कह सकते हैं, डॉ. खेताराम ने शून्य से सृजन कर बिना ट्यूबवेल बिना बिजली, रेगिस्तान में हरियाली की युक्ति को चरितार्थ किया है।

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