कार्तिक स्नान का माहत्म्य

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।।श्रीहरिः ।।
।।श्रीमते रामानुजाय नमः ।।

🙏 कार्तिक स्नान का महत्व🙏

मदनगंज किशनगढ़. कार्तिक स्नान आश्विन माह की पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर कार्तिक माह की पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस पवित्र स्नान को आरम्भ करने से पहले आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु को प्रणाम कर कार्तिक व्रत करने की आज्ञा ली जाती है।

कार्तिक मास में विधिपूर्वक स्नान करने के की विधिः-

दो घड़ी (48 मिनट) रात्रि शेष रहने पर स्नानार्थी को तुलसी की जड़ की मिट्टी, वस्त्र और जलपात्र (लोठा आदि) लेकर नदी, जलाशय, बावड़ी कुँआ, सुविधानुसार पुष्करराज, गंगा तट अथवा पवित्र नदी के किनारे जाकर पैर धोकर गंगाजी के साथ अन्य पवित्र नदियों का ध्यान व स्मरण करते हुए विष्णु, शिव आदि देवताओं का ध्यान व स्मरण करना चाहिए। उसके बाद नाभि तक जल में खड़े होकर निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

कार्तिकेsहं करिष्यामि प्रात: स्नानं जनार्दन:।
प्रीत्यर्थं तव देवेश दामोदर मया सह ।।

अर्थात् – हे जनार्दन देवेश्वर ! लक्ष्मी सहित आपकी प्रसन्नता के लिए मैं कार्तिक प्रात: स्नान करुँगा। उसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करें:- 

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे ।

नम: कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने ।।

नमस्तेsस्तु हृषीकेश गृहाणार्घ्यं नमोsस्तुते ।।

अर्थात् – आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्य को श्रीराधाजी सहित स्वीकार करें. हे हरे! आप पद्मनाभ को नमस्कार है, जल में शयन करने वाले आप नारायण को नमस्कार है. इस अर्घ्य को स्वीकार कीजिए. आपको बारम्बार नमस्कार है।
व्यक्ति किसी भी जलाशय में स्नान करे, उसे स्नान करते समय गंगा जी आदि पवित्र नदियों एवं पुष्करराज आदि तीर्थों का ही ध्यान करना चाहिए। सबसे पहले मृत्तिका (मिट्टी) आदि से स्नान कर ऋचाओं द्वारा अपने मस्तक पर अभिषेक करें। अघमर्षण और स्नानांग तर्पण करें तथा पुरुषसूक्त द्वारा अपने सिर पर जल छिड़के। इसके बाद जल से बाहर निकलकर दुबारा अपने मस्तक पर जल द्वारा प्रोक्षण करना चाहिए और वस्त्र बदलने चाहिए। वस्त्र बदलने के बाद तिलक आदि लगाना चाहिए। 

जब कुछ रात्रि शेष रह जाए तब स्नान किया जाना चाहिए क्योंकि यही स्नान उत्तम कहलाता है तथा भगवान विष्णु को पूर्ण रूप से संतुष्ट करता है। सूर्योदय काल में किया गया स्नान मध्यम स्नान कहलाता है।कृत्तिका अस्त होने से पहले तक का स्नान उत्तम माना जाता है। बहुत देर से किया गया स्नान कार्तिक स्नान नहीं माना जाता है।

मनीषियों द्वारा चार प्रकार के स्नान कहे गए हैं:-
1) वायव्य स्नान, 2) वारुण स्नान,
3) ब्राह्म स्नान तथा 4) दिव्य स्नान. 

वायव्य स्नान – जिस स्नान को गोधूलि द्वारा किया जाए वह वायव्य स्नान कहलाता है. 

वारुण स्नान – जो स्नान समुद्र आदि के जल से किया जाए वह वारुण स्नान कहलाता है।

ब्राह्म स्नान – वेद मन्त्रों के उच्चारण कर के जो स्नान किया जाता है उसे ब्राह्म स्नान कहते हैं।

दिव्य स्नान – मेघों तथा सूर्य की किरणों द्वारा जो जल शरीर पर गिरता है उसे दिव्य स्नान कहा जाता है।

यथाज्ञान मन्त्रोचारण करते हुए स्नान का विधान है। (मन्त्र न जानते हैं तो भगवान् का नाम सबसे बड़ा मन्त्र है।) प्राचीनकाल में कार्तिक मास में पुष्कर का स्पर्श पाकर नन्दा परम धाम को प्राप्त हुई थी. राजा प्रभञ्जन भी कार्तिक मास में पुष्कर में स्नान करने से व्याघ्र योनि से मुक्त हुए थे।
कार्तिक्यां ज्येष्ठ पुष्करे अत: कार्तिक मास में जो मनुष्य प्रात:काल उठकर पुष्करराज आदि तीर्थों में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है।

🙏 जयश्रीमन्नारायण सा 🙏

पंडित रतन शास्त्री, किशनगढ़ अजमेर
संपर्क –9414839743

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