होलिका राक्षसी थी, फिर भी क्यों होती है पूजा

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पंडित रतन शास्त्री, किशनगढ़
जयपुर।
होलाष्टक में सभी मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है। वैष्णव परिवारों में चर्चा का विषय बना रहता है कि होलिका क्यों मनाई जाती है? सामान्य से पौराणिक कथानक इसके आधार में प्रस्तुत कर दिया जाता है, जो सबको सम्भवत: ज्ञात है।

पौराणिक मतानुसार कथा इस प्रकार है –

होलिका दैत्येन्द्र हिरण्यकश्यपु की बहन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का कनिष्ठ पुत्र प्रह्लाद श्रीमन्नारायण विष्णु भगवान की पूजा -अर्चना ही नहीं करता था बल्कि परदेवता के रूप में उन्हीं की सत्ता स्वीकार करता था। जो हिरण्यकश्यपु को किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं थी। वह प्रह्लाद को सदा कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। लेकिन प्रह्लाद को यह कतई स्वीकार नहीं था। उसने प्रह्लाद को बहुत यातनाएँ दी। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे ताकि वह जलकर भस्म हो जाये। भाई के आदेशानुसार वह प्रह्लाद को में गोद में लेकर आग में बैठ गई। होलिका तो जल गई और प्रह्लाद बच गया। उसी होलिका दहन और भक्तप्रहलाद रक्षण की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है।

होलिका की होती है पूजा

यहां एक प्रश्न पैदा होता है कि यदि होलिका एक दैत्या थी तो उसका पूजन क्यों करे, लेकिन यह किया जाता है। होलिका दहन को मुहूर्तसे विद्वान पण्डित सम्पन्न करवाते है। अत: होलिकोत्सव पौराणिक आधार के साथ-साथ यह पर्व प्राचीनतम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ है। इस समय गेहूं, जो आदि कि फसल पक जाती है। दानेंदार गेहूं के पौधे को होलक कहा जाता है जैसा कि शब्द कल्पद्रुम स्पष्ट कहता है:-

तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष)
इसी प्रकार भावप्रकाश निघण्टु कहता है कि:-
अद्र्ध पक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह।(भाव प्रकाश)

अर्थात -तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमी-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है।

(ब) होलिका – किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं-जैसे-चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूं, जौ की गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूं, जौ की गिद्दी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते है कि वह चनादि का निर्माण करती है (माता निर्माता भवति)। यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात होलिका रूपी पट (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया।

(स) अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (इष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है। यथा-वासन्तो=वसन्त ऋतु। नव=नये। सस्य= तृण। इष्टि=यज्ञ। होली का दिन सम्वत्सर का आखिरी दिन होता है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव एवं पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे।

पहले पितरों को भोग लगाने की परंपरा

हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है -(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल पकने का दिन है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, जो कैसे सम्भव हो। तो कहा गया है-

अग्निवै देवानाम् मुखं अर्थात अग्नि देव पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि की अग्नि में आहुति दी जायेगी। वह सूक्ष्म होकर पितरों-देवों को प्राप्त होगा।

हमारे यहां आर्यों में चातुर्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्यमास यज्ञ के वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं-
(1) आषाढ़ मास,
(2) कार्तिक मास (दीपावली)
(3) फाल्गुन मास (होली)
यथा फाल्गुन्या पौणामज़स्यां चातुर्मास्यानि प्रयुजीत मुखं वा एतत् सम्वत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी अर्थात् फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी अमावस्या को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्मास यज्ञ कहे जाते हैं। आग्रहण या नव संस्येष्टि।

यज्ञ का प्रतीक है होली का त्योहार

आप प्रतिवर्ष होली जलाते हो। उसमें आखत (अक्षत) डालते हो, जो आखत हैं -वे अक्षत का अपभ्रंश रूप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहूति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहूति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। आप जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। आपकी इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी। इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रूपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे।

आप जो गुलरियाँ (बडूल्या) बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे। दूसरा कारण यह भी था।

ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते – अर्थात् ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है।

होली उत्सव यज्ञ का प्रतीक है। स्वयं से पहले जड़ और चेतन देवों को आहुति देने का पर्व हैं। आइये इसके वास्तविक स्वरूप को समझ कर इस सांस्कृतिक त्योहार को मनाये। होलिका दहन रूपी यज्ञ में यज्ञ परम्परा का पालन करते हुए शुद्ध सामग्री, तिल, मूंग , जड़ी बूटी आदि का प्रयोग कीजिये।

आप सभी को होली उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

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