दस पापों का हरण करता है दशहरा पर्व

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।।श्रीहरिः ।।
।। श्रीमते रामानुजाय नमः।।

मदनगंज किशनगढ़. वैदिक सनातन मतावलम्बियों का महानतम् पर्व दशहरा है।
आज ही के दिन कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुसमर्थ कोटि-कोटि कन्दर्प-दर्प-दलन भगवान् श्रीराम ने राक्षसराज दशानन रावण का वध कर राक्षस संस्कृति का विनाश करते हुए वैदिक संस्कृति की रक्षा की थी।
‘दशहरा’ एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “दस को हरने वाली [तिथि] । “दश हरति इति दशहरा”। ‘दश’ कर्म उपपद होने पर ‘हृञ् हरणे’ धातु से “हरतेरनुद्यमनेऽच्” (३.२.९) सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय होकर ‘दश + हृ + अच्’ हुआ, अनुबन्धलोप होकर ‘दश + हृ + अ’, “सार्वधातुकार्धधातुकयोः” (७.३.८४) से गुण और ‘उरण् रपरः’ (१.१.५१) से रपरत्व होकर ‘दश + हर् + अ’ से ‘दशहर’ शब्द बना और स्त्रीत्व की विवक्षा में ‘अजाद्यतष्टाप्‌’ से ‘टाप्’ (आ) प्रत्यय होकर ‘दशहर + आ’ = ‘दशहरा’ शब्द बना।

संस्कृत में यह शब्द “गङ्गादशहरा” के लिये और हिन्दी और अन्य भाषाओं में विजयादशमी के लिये प्रयुक्त होता है। दोनों उत्सव दशमी तिथि पर मनाए जाते हैं।

‘स्कन्द पुराण’ की ‘गङ्गास्तुति’ के अनुसार ‘दशहरा’ का अर्थ है “दस पापों का हरण करने वाली”(तिथि) ।
पुराणों के अनुसार ये दस पाप हैं ।

१. “अदत्तानामुपादानम्” अर्थात् जो वस्तु न दी गयी हो उसे अपने लिये ले लेना।
२. “हिंसा चैवाविधानतः” अर्थात् ऐसी अनुचित हिंसा करना जिसका विधान न हो।
३. “परदारोपसेवा च” अर्थात् परस्त्रीगमन उपलक्षण से परपुरुषगमन भी
ये तीन “कायिकं त्रिविधं स्मृतम्” अर्थात् तीन शरीर-संबन्धी पाप हैं।

४. “पारुष्यम्” अर्थात् कठोर शब्द या दुर्वचन कहना
५. “अनृतम् चैव” अर्थात् असत्य कहना
६. “पैशुन्यं चापि सर्वशः” अर्थात् सब-ओर कान भरना (किसी की चुगली करना)
७. “असम्बद्धप्रलापश्च” अर्थात् ऐसा प्रलाप करना (बहुत बोलना) जिसका विषय से कोई संबन्ध न हो
ये चार “वाङ्गमयं स्याच्चतुर्विधम्” अर्थात् चार वाणी-संबन्धी पाप हैं।

८. “परद्रव्येष्वभिध्यानम्” अर्थात् दूसरे के धन का [उसे पाने की इच्छा से] एकटक चिन्तन करना।
९. “मनसानिष्टचिन्तनम्” अर्थात् मन के द्वारा किसी के अनिष्ट का चिन्तन करना
१०. “वितथाभिनिवेशश्च” अर्थात् असत्य का निवेश करना, झूठ में मन को लगाए रखना
ये तीन “मानसं त्रिविधं स्मृतम्” अर्थात् तीन मन-संबन्धी पाप हैं।

जो तिथि इन दस पापों का हरण करती देती है वह ‘दशहरा’ है।
यद्वा ‘दश रावणशिरांसि रामबाणैः हारयति इति दशहरा’
जो तिथि रावण के दस सिरों का श्रीराम के बाणों द्वारा हरण कराती है वह दशहरा है।
रावण के दस सिरों को पूर्वोक्त दस शरीर, वाणी, और मन संबन्धी पापों का प्रतीक भी है।
स्वत:प्रमाण वेद भी अपरोक्षरूप से दशहरा का वर्णन करता है।

अन्तो वा एष यज्ञस्य यद् दशममहः।
(तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/६/१)

अथ यद् दशरात्रमुपयन्ति।
विश्वानेव देवान्देवतां यजन्ते।
(शतपथ ब्राह्मण १२/१/३/१७ )
प्राणा वै दशवीराः।
(यजु १९/४८, शतपथ ब्राह्मण १२/८/१/२२)
साक्षात् भगवान् नारायण गोरूपधारिणी पृथ्वी की आर्त्त प्रार्थना पर श्रीअयोध्या में प्रकट होकर धार्मिकजनों का उन्नयन कर अधार्मिकों का विनाश किया था, जो प्राणियों के हृदय में रमण करते हैं,जिनकी सेवा प्राप्ति के लिए स्वयं शम्भू सदाशिव वानर सा रूप धारणकर हनुमान् बन गये।
जिनके श्रीचरणों का धोया हुआ जल ‘श्रीचरणामृत ‘ देवनदी देवापगा भागीरथी गङ्गा बना जिसे महादेव आशुतोष शंकर जी अपने मस्तक पर धारण करते हैं-
भजु मन रामचरण सुखदायी ।
जिन चरणन से निकली सुरसरि संकर जटा समायी॥
उन्हीं भगवान् श्रीराम की शरणागति ही जीव के अन्तिम लक्ष्य श्रीराम को प्राप्त करा देती है।
शरणागति ही अन्यतम मार्ग है।
‘नान्य: पंथा विद्यतेऽयनाय’

शरणागति में अमोघ शक्ति है।
शरणागति श्रीभगवान् के दिव्य पादपद्मों में केवल एक ही बार की जाती है।
” सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।
( वा० रा०-६।१८।३३ )
सकृदेव अर्थात् -एकबार
श्रीभगवान् शरण में आये हुये प्राणियों का कभी भी परित्याग नहीं करते क्योंकि ऐसा उनका व्रत है’ –
एतद्व्रतं मम व्रतवदिदं कस्यांचिदपि दशायां –

परित्यागायोग्यमित्यर्थ:’
( श्री -गोविन्दराज )

शरणागति में श्रीभगवान् के स्थैर्य, धैर्य, माधुर्य, वात्सल्य,शेषीत्व पर महाविश्वास होना परम आवश्यक है ।
शरणागति में –
‘ न धर्मनिष्ठोस्मि न चात्मवेदी
न भक्तिमांस्त्वच्चरणारविन्दे

  • अकिंचनोनन्यगति: शरण्य त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ॥ ( आलवन्दारस्तोत्र )
    ऐसा भाव बनना चाहिये।
    हे नारायण ! हे श्रीराम ! हे गोविन्द !
    मुझमें न भक्ति है ,न धर्मनिष्ठा ही ; यदि कुछ है तो ,मात्र इतना ही कह सकता हूँ कि मैं अकिंचन हूँ, यदि कोई अवलम्ब है तो हे रघुनाथजी! केवल श्रीमान् के श्रीचरणारविन्द है, जिन्हें मैंने पकड़ लिया है। “श्रीमन्नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये, श्रीमते नारायणाय नम: ।
    श्रीविभीषण जी कहते हैं-‘ परित्यक्ता मया लंका मित्राणि च धनानि च’ ।
    व्रजगोपिका कहतीं हैं-
    मैवं विभोर्हति भवान् गदितुं नृशंसं सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।
    ( श्रीमद्भागवत- १०।२९।३१ )
    भगवद्रामानुज ने कहा-‘
    पितरं मातरं -दारान्पुत्रान्वन्धून्सखीन्गुरुन्।

रत्नानि धनधान्यानि क्षेत्राणि च गृहाणि च।
सर्वधर्मांश्च संत्यज्य सर्वकामांश्च साक्षरान्।
लोकविक्रान्तचरणौ शरणं ते व्रजं विभो।।

निश्चित बात है, हृदय से सच्ची शरणागति की जाय तो अवश्य ही श्रीभगवान् मिलेंगे ।

जयश्रीमन्नारायण

पंडित रतन शास्त्री, किशनगढ़, अजमेर। मोबाइल नंबर 9414839743

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