क्या आप जानते हैं वैदिक काल में भी मनाया जाता था होली का त्योहार

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पंडित रतन शास्त्री, किशनगढ़

जयपुर। होली भारत वर्ष में मनाये जाने वाले त्योहारों में प्रमुख महापर्व है। यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा को होलिका दहन होता है और अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (एकम्) को धूलिवन्दन (धूलण्डी /रंगभरी ) मनायी जाती है। हमारी स्थानीय भाषा में होली का राम राम भी कहते हैं।

होलिका दहन मुहूर्त

इस वर्ष चूंकि फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी गुरुवार, 17 मार्च 2022 को मध्याह्न 01. 29 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ होकर अगले दिन 18 मार्च को मध्याह्न 12. 46 बजे तक है। ऐसी स्थिति में होलिका दहन चतुर्दशी गुरुवार, 17 मार्च को ही होना धर्मशास्त्र सम्मत है। भद्रा में रक्षाबंधन एवं होलिका दहन वर्जित है। इस दिन 17 मार्च को मध्याह्न 01. 29 बजे से भद्रा लग जायेगी, जो रात्रि 01 बजकर 09 मिनट तक रहेगी। अत: धर्मशास्त्रानुसार
‘मध्यरात्रिमतिक्रम्य विष्टि पुच्छं यदा भवेत प्रदोषे ज्वालयेद्वह्नि सुख सौभाग्यदायिनी।।’

इस आदेशानुसार सूर्यास्त प्रदोष काल और अमृत चौघडिय़ा कालावधि में 06. 43 बजे से 08.10 बजे तक होलिका दहन करना श्रेयस्कर रहेगा।
मतान्तर से –
‘पृथिव्यां यानि कार्याणि शुभानिह्यशुभानि च।
तानि सर्वाणि सिद्ध्यन्ति विष्टिपुच्छे न संशय:।।’
इस आदेशानुसार रात्रि 09 बजकर 06 मिनट से 10 बजकर 16 मिनट तक भी होलिका दहन मुहूर्त धर्मशास्त्र सम्मत है।

मदनोत्सव ही होली का पर्व

यह महोत्सव वैदिक काल से मनाया जाता रहा है। वैदिक काल में वासन्ती नव सस्येष्टि/मदनोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस समय गेहूं, चने आदि की फसल पक जाती है। अत: नवान्न की अग्नि में आहुति देकर सभी एक दूसरे को नवान्न भक्षण करवाते थे। यह परम्परा अद्यतन चल रही है। कालान्तर में हिरण्यकशिपु की बहन होलिका एवं उसके पुत्र प्रह्लाद की कथा से जोडक़र मनाया जाने लगा। शमीवृक्ष को निर्धारित स्थान पर गाडक़र उपले, घास आदि से आवृत करके शुभमुहूर्त में होली जलाई जाती है। अगले दिन सभी लोग घर घर जाकर एक दूसरे का अभिवादन करते हुए विगत वर्ष में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करते हैं। इसे होली का राम राम कहते हैं। एक दूसरे पर रंग, गुलाल लगाकर अपना स्नेह प्रकट करते हैं।

होली का त्योहार प्रेम-सौहार्द, स्नेह – वात्सल्य, भातृत्वभाव, प्रकृतिप्रेम, मदनोत्सव, हास – परिहास, मनोविनोद, सद्भावों से परिपूरित पावन पुनीत सांस्कृतिक महापर्व है। यह रंगों का त्योहार हमारे जीवन में अनन्त सुख-समृद्धि, प्रसन्नता, उमंग, उत्साह के साथ हमारी जीवन रूपी वाटिका को पल्लवित और पुष्पित करता है। त्योहारों से हमारा सामाजिक जीवन नूतन उत्साह और प्रसन्नता के विविध रंगों से सराबोर हो जाता है।

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