क्या आप जानते हैं 16 अप्रेल को हनुमान जी की जयंती है या जन्मोत्सव

Spread the love
पंडित रतन शास्त्री, किशनगढ़।

किशनगढ़, 15 अप्रेल। हनुमज्जयन्ती शब्द हनुमज्जन्मोत्सव की अपेक्षा विलक्षण एवं रहस्यगर्भित है।

कल चैत्र शुक्ल पूर्णिमा शनिवार विक्रमसंवत्सर 2079 तदनुसार दिनांक 16 अप्रैल 2022 हनुमज्जयन्ती का महोत्सव आ रहा है। आजकल वाट्सएप्प से ज्ञानवितरण करने वाले कुछ मित्र एक सन्देश सर्वत्र प्रेषित कर रहे हैं कि हनुमज्जयन्ती न कहकर इसे हनुमज्जन्मोत्सव कहना चाहिए, क्योंकि जयन्ती मृतकों की मनायी जाती है। इस संबंध में निम्नलिखित श्लोक के माध्यम से तर्क प्रस्तुत है-
जयन्ती के अर्थ हैं – पताका, इन्द्र की पुत्री, भगवती दुर्गा। जयन्ती– जये +शतृ +ङीप् अर्थात् वह जिसकी जय हो। कोई भी अर्थ मृत्य मानव को इंगित नहीं करता। जयन्ती किसी महत्वपूर्ण कार्य के आरम्भ /घटित होने की वार्षिक तिथि पर होने वाले उत्सव को कहते हैं।
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित।।

अर्थात् – अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय- ये आठों अमर हैं।
इस तरह हनुमान जी अमर हैं फिर इनकी जयंती कैसे मनाई जा सकती है।
इनमें व्यास जी, हनुमानजी व परशुराम जी महाराज के जन्मोत्सव शास्त्र में जयन्ती के नाम से प्रसिद्ध है। पाराशर संहिता में ” हनुमज्जयन्ती” का विधान दिया है।
जयन्ती शब्द के संबंध में यह मात्र भ्रान्ति ही है। अतः पहले जयन्ती का अर्थ समझ लेना चाहिए —

जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः। –स्कन्दमहापुराण,
तिथ्यादितत्त्व,

जो जय और पुण्य प्रदान करे उसे जयन्ती कहते हैं ।
कृष्णजन्माष्टमी से भारत का प्रत्येक प्राणी परिचित है । इसे कृष्णजन्मोत्सव भी कहते हैं । किन्तु जब यही अष्टमी अर्धरात्रि में पहले या बाद में रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो जाती है तब इसकी संज्ञा “कृष्णजयन्ती” हो जाती है —

रोहिणीसहिता कृष्णा मासे च श्रावणेSष्टमी ।
अर्द्धरात्रादधश्चोर्ध्वं कलयापि यदा भवेत् ।
जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी ।।
इस जयन्ती व्रत का महत्त्व कृष्णजन्माष्टमी अर्थात् रोहिणीरहित कृष्णजन्माष्टमी से अधिक शास्त्रसिद्ध है । इससे यह सिद्ध हो गया कि जयन्ती जन्मोत्सव ही है । अन्तर इतना है कि योगविशेष में जन्मोत्सव की संज्ञा जयन्ती हो जाती है । यदि रोहिणी का योग न हो तो जन्माष्टमी की संज्ञा जयन्ती नहीं हो सकती–

चन्द्रोदयेSष्टमी पूर्वा न रोहिणी भवेद् यदि ।
तदा जन्माष्टमी सा च न जयन्तीति कथ्यते ॥ –नारदीयसंहिता
जयन्त्याम् उपवासश्च महापातक नाशनः ।
सर्वेः कार्यो महाभक्त्या पूजनीयश्च केशवः।।
(भविष्यपुराण, विष्णुधर्मोत्तर.)
श्री कृष्ण जयन्ती का व्रत महापातक का विनाश कर देता है। अतः भक्तिपूर्वक यह व्रत करते हुये भगवान् श्रीकृष्ण का पूजन करें।

अयोध्या में श्रीरामानन्द सम्प्रदाय के सन्त कार्तिक मास में स्वाति नक्षत्रयुक्त कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को हनुमान् जी महाराज की जयन्ती मनाते हैं।

स्वात्यां कुजे शैवतिथौ तु कार्तिके कृष्णेSञ्जनागर्भत एव मेषके ।
श्रीमान् कपीट्प्रादुरभूत् परन्तपो व्रतादिना तत्र तदुत्सवं चरेत् ॥

–वैष्णवमताब्जभास्कर

कहीं भी किसी मृत व्यक्ति के मरणोपरान्त उसकी जयन्ती नहीं अपितु पुण्यतिथि मनायी जाती है । भगवान् की लीला का संवरण होता है । मृत्यु या जन्म सामान्य प्राणी का होता है । भगवान् और उनकी नित्य विभूतियाँ अवतरित होती हैं । और उनको मनाने से प्रचुर पुण्य का समुदय होने के साथ ही पापमूलक विध्नों का नकारात्मक ऊर्जा का संक्षय होता है । इसलिए हनुमज्जयन्ती नाम शास्त्र प्रमाणानुमोदित ही है।

“जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः” –स्कन्दमहापुराण, तिथ्यादितत्त्व

जैसे कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता मात्र रोहिणीविरहित अष्टमी से बढ़ जाती है, और उसकी संज्ञा जयन्ती हो जाती है । ठीक वैसे ही कार्तिक मास में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से स्वाति नक्षत्र तथा चैत्र मास में पूर्णिमा से चित्रा नक्षत्र का योग होने से कल्पभेदेन हनुमज्जन्मोत्सव की संज्ञा ” हनुमज्जयन्ती” होने में कोई सन्देह नहीं है।

एकादश रुद्रस्वरूप भगवान् शिव ही हनुमान् जी महाराज के रूप में भगवान् विष्णु की सहायता के लिए चैत्रमास की चित्रा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा को अवतीर्ण हुए हैं।

” यो वै चैकादशो रुद्रो हनुमान् स महाकपिः।
अवतीर्ण: सहायार्थं विष्णोरमिततेजस: ॥
स्कन्दमहापुराण,माहेश्वर खण्डान्तर्गत, केदारखण्ड-८/१००

पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रानक्षत्रसंयुते ॥
चित्रा नक्षत्र से संयुक्त पूर्णिमा अर्थात् चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को श्री आञ्जनेय केसरीनन्दन हनुमानजी महाराज की जयन्ती मनायी जाती है।
इसलिए मेरे विचार से हनुमज्जयन्ती शब्द औचित्यपूर्ण है। और श्रीहनुमज्जयन्ती आदि अवसरों पर जयन्ती शब्द पर वाद – विवाद /तर्क – वितर्क करना शास्त्र विमुखता का परिचायक है। विद्वज्जन इस पर शास्त्रमत /प्रामाणिक स्वमत दे सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.