बिना तेल-घी के सैकड़ोंं सालों से जल रहा दीया, प्रतिमा को आता है पसीना

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तिरुपति बालाजी मंदिर में हमेशा श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। यह मंदिर आंध्र प्रदेश में तिरुमला की पहाडिय़ों पर है। यह मंदिर भारत में हिंदू धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान बालाजी यहां पत्नी पद्मावती के साथ निवास करते हैं। मंदिर में रोज करीब एक लाख तीर्थयात्री आते हैं । त्योहारों पर संख्या 5 लाख से भी अधिक हो जाती है। इस मंदिर से काफी सारे रहस्य जुड़े हैं, जिनके बारे में हम आपको बता रहे हैं-

भगवान तिरुपति के मंदिर में एक दीया वर्षों से जल रहा है। इस दीये में आज तक न तो किसी ने कभी घी डाला है और न ही तेल। फिर भी यह दीया वर्षों से लगातार जल रहा है। किसी को भी यह पता नहीं है कि यह दीया कितने सालों से जल रहा है।

मंदिर के मुख्य द्धार पर छड़ी

मंदिर के मुख्य द्वार पर दाईं ओर एक छड़ी है। इस छड़ी के बारे में कहा जाता है कि बाल्यावस्था में इस छड़ी से ही भगवान बालाजी की पिटाई की गई थी, इस कारण उनकी ठोड़ी पर चोट लग गई थी। तब से आज तक उनकी ठोड़ी पर लगी इस चोट पर हर शुक्रवार को चंदन का लेप किया जाता है, जिससे कि उनका घाव भर जाए।

एक दशक से भी ज्यादा लगा मंदिर निर्माण में

इस मंदिर को टेम्पल ऑफ सेवन हिल्स भी कहा जाता है। तिरुमाला गांव में इस मंदिर को द्रविडिय़न शैली में बनाया गया है। इस मंदिर के निर्माण की शुरुआत 300 ईस्वी में हुई। इसे बनाने में एक दशक से भी ज्यादा समय लगा था। इसके गर्भगृह को अनंदा निलयम भी कहा जाता है।

पवित्र जल कुण्ड

यहां एक पवित्र जल कुण्ड है, जिसमें डुबकी लगाए बिना श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। मान्यता है कि वैकुण्ठ में भगवान विष्णु इसी कुण्ड में स्नान किया करते थे। माना जाता है कि इस कुण्ड में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को सभी सुख प्राप्त होते हैं।

मुख्यद्वार के दाई ओर एक छड़ी है। बालाजी के सिर पर अनंताळवारजी के द्वारा इस छड़ी से मारने पर ठोड़ी पर चोट लगी थी। कहते हैं कि इस दौरान बालरूप में बालाजी को ठोड़ी से रक्त निकल आया था। उसी समय से बालाजी की ठोड़ी पर चंदन लगाना शुरू किया गया, जो आज तक जारी है। भगवान बालाजी के सिर पर आज भी रेशमी बाल हैं और उनमें उलझने नहीं आती हैं, वह हमेशा ताजा लगते हैं।

मंदिर से 23 किलोमीटर दूर एक गांव है, उस गांव में बाहर से आने वाले व्यक्तियों को प्रवेश नहीं दिया जाता है। वहां लोग धार्मिक नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हैं। वहां की महिलाएं सिले हुए कपड़े नहीं पहनती हैं। वहीं से लाए गए फूल ही भगवान तिरुपति को अर्पित किए जाते हैं। दूध, घी, मक्खन आदि भी भगवान को चढ़ाने के लिए वहीं से आता है। गृभगृह में चढ़ाई गई किसी वस्तु को बाहर नहीं लाया जाता, बालाजी के पीछे एक जलकुंड हैं, उसमें ही उन वस्तुओं का विसर्जन कर दिया जाता है।

प्रतिमा को आता है पसीना

बालाजी की पीठ को जितनी बार भी साफ करो, वहां गीलापन रहता ही है। ऐसा माना जाता है कि बालाजी की प्रतिमा को पसीना आता है। प्रतिमा के पास कान लगाने पर समुद्र में लहरों के उठने जैसी आवाज सुनाई देती है। भगवान बालाजी की प्रतिमा पर खास तरह का कपूर पचाई कपूर लगाया जाता है। वैज्ञानिकों का मत है कि इस कपूर को किसी भी प्रतिमा पर लगाने पर वह चटक जाती है, लेकिन इस प्रतिमा पर इसका कोई असर नहीं होता है।
बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। हर गुरुवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छवि उतर आती है। कहते है कि लक्ष्मीजी उनके साथ ही निवास करती हैं। इसीलिए बालाजी के शरीर पर नीचे धोती व ऊपर की तरफ साड़ी पहनाई जाती है।

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