नवरात्र में अधिक फलदायी रहते हैं व्रत-पूजन

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13 अप्रेल से प्रारंभ होंगे वासंती नवरात्र
नौ दिन तक चलेंगे देवी पूजन एवं धर्मग्रंथों के पाठ

जयपुर। नवरात्र में व्रत पूजन अधिक फलदायी सिद्ध होते है, वहीं आध्यात्म साधना के लिए भी नवरात्र श्रेष्ठ समय रहता है। इस वर्ष वासन्ती नवरात्र चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा मंगलवार 13 अप्रैल से प्रारम्भ हो रहे हैं।
घटस्थापना जयपुर स्टैंडर्ड समयानुसार अभिजित् मुहूर्त मध्याह्न 12.02 से 12.52 बजे तक श्रेष्ठ रहेगा। चौघडिय़ा मुहूर्त अनुसार 10.53 से मध्याह्न 2.13 बजे तक तक किया जा सकता है।
अजमेर जिले के मदनगंज-किशनगढ़ निवासी पंडित रतनलाल शास्त्री (दादिया वाले) ने बताया कि इन नवरात्र में शाक्त-शक्ति उपासकों को दुर्गा सप्तशती, ललिता सहस्रनामस्तोत्र, दुर्गा सहस्रनामस्तोत्र आदि का अनुष्ठान करना अतिश्रेष्ठ रहता है, वहीं श्रीवैष्णव उपासक जो वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस का नवाह्न पारायण, सुन्दर काण्ड, रामरक्षास्तोत्र आदि का अनुष्ठान अतिश्रेष्ठ रहता है। नवरात्र में कुलदेवी दुर्गाष्टमी की पूजा अष्टमी मंगलवार 20 अप्रैल को ही होगी। रामनवमी उत्सव नवमी 21 अप्रैल को मनाया जाएगा।

नवरात्र में किया जाता है कन्या पूजन

पंडित रतन शास्त्री

नवरात्र में व्रत का बहुत महत्व है। वासंती नवरात्र का समय ऋतुसंधि काल है। इस समय बसंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव रहता है। अत: इस समय एक समय भोजन करना शारीरिक दृष्टि से भी उत्तम रहता है। साथ ही धर्म उपासना में भी सहायक सिद्ध होता है। नवरात्र में कन्या भोजन का बड़ा महत्व है। अष्टमी या नवमी के दिन 9 कन्या जो 10 वर्ष से अधिक की न हो एवं दो बालकों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देना चाहिए। क्योंकि कन्यायें शक्ति स्वरूपा जगदम्बा का साक्षात् स्वरूप है।

नवरात्र का रहस्य

चान्द्रमास के अनुसार चार नवरात्र होते हैं- आषाढ़ शुक्ल पक्ष में आषाढ़ीय गुप्त नवरात्र, आश्विन शुक्लपक्ष में शारदीय नवरात्र, माघ शुक्ल पक्ष में शिशिर कालीन गुप्त नवरात्र एवं चैत्र शुक्ल पक्ष में वासन्ती नवरात्र होते है। परंपरा से दो नवरात्र चैत्र एवं आश्विन मास के नवरात्र ही सर्वमान्य है। चैत्रमास मधुमास एवं आश्विन मास ऊर्ज मास नाम से प्रसिद्ध है जो शक्ति के पर्याय हैं। अत: शक्ति आराधना के लिए इस काल खण्ड को नवरात्र शब्द से सम्बोधित किया गया है। नवानां रात्रीणां समाहार: अर्थात् नौ रात्रियों का समूह। रात्रि का तात्पर्य है विश्रामदात्री, सुखदात्री के साथ एक अर्थ जगदम्बा भी है।
रात्रिरुपयतो देवी दिवरुपो महेश्वर: तन्त्रग्रन्थों में तीन रात्रि कालरात्रि (महाशिवरात्रि) फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी महाकाली की रात्रि, मोहरात्रि-आश्विन शुक्लपक्ष अष्टमी महासरस्वती की रात्रि, महारात्रि-कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या महालक्ष्मी की रात्रि।

सृष्टि का प्रारंभ 1 अंक से

पंडित रतन शास्त्री ने बताया कि एक अंक से सृष्टि का आरम्भ है। सम्पूर्ण मायिक सृष्टि का विस्तार आठ अंक तक ही है। इससे परे ब्रह्म है जो नौ अंक का प्रतिनिधित्व करता है अस्तु नवमी तिथि के आगमन पर शिव शक्ति का मिलन होता है। शक्ति सहित शक्तिमान् को प्राप्त करने के लिए भक्त को नवधा भक्ति का आश्रय लेना पड़ता है। जीवात्मा नौ द्वार वाले पुर यानि शरीर का स्वामी है। नवछिद्रमयो देह: इन छिद्रों को पार करता हुआ जीव ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है।

नौ दिन तक देवी अराधना

अत: नवरात्र की प्रत्येक तिथि के लिए कुछ साधन ज्ञानियों द्वारा नियत किए गए है। इसमे प्रतिपदा को शुभेच्छा कहते हैं। जो प्रेम जगाती है प्रेम बिना सब साधन व्यर्थ है अस्तु प्रेम को अविचल अडिग बनाने के लिए शैलपुत्री का आवाहन पूजन किया जाता है। अचल पदार्थों में पर्वत सर्वाधिक अटल होता है। द्वितीया कों धैर्यपूर्वक द्वैतबुद्धि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए माँ बह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए। तृतीया-त्रिगुणातीत (सत्-रज-तम) से परे होकर माँ चन्द्रघण्टा का पूजन करते हुए मन की चंचलता को वश में करना चाहिए। चतुर्थी को अन्त:करण चतुष्टय मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का त्याग करते हुए मन बुद्धि को कूष्माण्डा देवी के चरणों में अर्पित करें। पंचमी को इन्द्रियों के पाँच विषयों अर्थात् शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का त्याग करते हुए स्कन्दमाता का ध्यान करें। षष्ठी को काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ एवं मात्सर्य का परित्याग करके कात्यायनी देवी का ध्यान करें। सप्तमी को रक्त, रस, माँस, मेदा, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र इन सप्त धातुओं से निर्मित क्षण भंगुर दुर्लभ मानव देह को सार्थक करने के लिए कालरात्रि देवी की आराधना करें। अष्टमी को ब्रह्म की अष्टधा प्रकृति पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहंकार से परे महागौरी के स्वरूप का ध्यान करता हुआ ब्रह्म से एकाकार होने की प्रार्थना करें। नवमी को माँ सिद्धिदात्री की आराधना से नवद्वार वाले शरीर की प्राप्ति को धन्य बनाता हुआ आत्मस्थ हो जाए।

आठ शक्तियां करती है कल्याण

पौराणिक दृष्टि से आठ लोकमाताएँ हैं तथा तन्त्रग्रन्थों में आठ शक्तियाँ है। पहली ब्राह्मी सृष्टिक्रिया प्रकाशित करती है। दूसरी माहेश्वरी प्रलय शक्ति है। तीसरी कौमारी आसुरी वृत्तियों का दमन करके दैवीय गुणों की रक्षा करती है। चौथी वैष्णवी सृष्टि का पालन करती है। पांचवी वाराही आधार शक्ति है इसे काल शक्ति कहते है। छठी नारसिंही ब्रह्म विद्या के रूप में ज्ञान को प्रकाशित करती है। सातवीं ऐन्द्री विद्युत शक्ति के रूप में जीव के कर्मों को प्रकाशित करती है। आठवीं चामुण्डा प्रवृत्ति (चण्ड) निवृत्ति (मुण्ड) का विनाश करने वाली है।


दुर्गुणों का नाश ही भक्ति

आठ आसुरी शक्तियाँ मोह-महिषासुर, काम-रक्तबीज, क्रोध-धूम्रलोचन, लोभ-सुग्रीव, मद मात्सर्य-चण्ड मुण्ड, राग द्वेष-मधु कैटभ, ममता-निशुम्भ, अहंकार-शुम्भ। अष्टमी तिथि तक इन दुर्गुणों रूपी दैत्यों का संहार करके नवमी तिथि को प्रकृति-पुरुष का एकाकार होना ही नवरात्र का आध्यात्मिक रहस्य है। नौ ही क्यों-
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे प्रकृतिरष्टधा।
कहकर भगवान ने आठ प्रकृतियों का प्रतिपादन किया है। इनसे परे केवल ब्रह्म ही है अर्थात् आठ प्रकृति एवं एक बह्म ये नौ हुए जो परिपूर्णतम है। नौ देवियां, शरीर के नौ छिद्र, नवधा भक्ति, नवरात्र ये सभी पूर्ण हैं।
नौ के अतिरिक्त संसार मे कुछ नहीं है। इसके अतिरिक्त जो है वह शून्य है।

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